Thursday, September 5, 2013


अच्छा लगता है जब ज़िन्दगी में किसी खास के होने एहसास होता है।
उसके दूर होने और पास आने का एहसास होता है।
अच्छा लगता है जब किसी की याद सताने  लगती है। 
पल पल दूरी का एहसास जताने लगती है।
 अच्छा लगता है जब पानी ठहर सा जाता है।
किनारों से हटके कुछ बिखर सा जाता है।
अच्छा लगता है ये खुला आसमां भी
जब बादलों की आग़ोश में सिमट सा जाता है।
ये चहचहाते पंछी उड़ते गगन में
तितलियों का रंग भी कितना प्यारा लगता है।
अच्छा लगता है तब सुर्ख़ गुलाब
और तब भी जब हल्का सा लाल होता है।
अच्छा लगता है जब ज़िन्दगी में किसी खास के होने एहसास होता है।
उसके दूर होने और पास आने का एहसास होता है।

Tuesday, September 3, 2013

क्यूँ परेशान, हैरान सा हो जाता है

क्यूँ परेशान, हैरान सा हो जाता है 
          क्यूँ  आदमी यहाँ , 
आदमी से अनजान हो जाता है.
          कोई होता है कहाँ किसी का होकर 
 आज साथ चलकर कल भूल जाता है.
           क्यूँ  आदमी यहाँ , 
आदमी से अनजान हो जाता है.
          वक़्त बदल जाता है, 
ये तो फितरत में है उसके 
             क्या खता है मौसम की 
जो मौसम बदल जाता है.
             क्यूँ  आदमी यहाँ , 
आदमी से अनजान हो जाता है.
              क्यूँ परवाह करता है मुसफ़िर 
 तू उसके बिछड़ जाने का 
              मंजिलों पर आकर अक्सर 
कारवां बिछड़ जाता है. 
              क्यूँ परेशान, हैरान सा हो जाता है 
क्यूँ  आदमी यहाँ , 
              आदमी से अनजान हो जाता है.
                                                            विधू 

   
 

Saturday, August 17, 2013

जी चाहे उड़ जाऊ पंछी बनकर

जी चाहे उड़ जाऊ पंछी बनकर 
                    उस नील खुले आसमां के तले 
जहाँ कोई रोके ना टोके मुझे 
                     जहाँ ना कोई दीवार सरहदों की हो 
जहाँ बंदिशें ना कोई हो 
                    ना धर्म और जाति का भी कोई  बंधन हो 
बस सबका एक आसमां हो 
                    एक ही वो चंदा और 
एक ही सबका सूरज हो।

Wednesday, January 16, 2013

जो भी पाया तुमसे।



बेवजह न था जो भी पाया तुमसे। 
ख़ुशी क्या दर्द भी काम आया मेरे।।
एक पल भी जुदा न हुए थे तुमसे,
जुदाई का सबब भी दिखाया तुमने।
चाहतों के लिए रोया करते थे हम, 
तुमको पाने के लिए चुप चुप कर रोया मैंने।
आँखों में सपने हमने भी बसाये,
अब टूटे हुए आईने को फिर कैसे सजाए।
मस्त थी वो ज़िंदगी भी अपनी, 
जब सबके दिलों में बसा करते थे हम।
जबसे बसाया है दिल में तुम्हे, 
सब क्या हम ही दूर हो गए है सबसे।
बेवजह न था जो भी पाया तुमसे। 
ख़ुशी क्या दर्द भी काम आया मेरे।।
 vidhu

Wednesday, September 19, 2012

जरुरी तो नही.............

हर हंसी के पीछे ख़ुशी हो,
यह जरुरी तो नही   !
जो हम कहे वह हर बार सही हो,
यह जरुरी तो नही !!
आज रात अँधेरी है पर,
हर रात अँधेरी हो,
यह जरुरी तो नही  !
कोई रूठा है अपना,
मना लो उसे आज ही
कल मानने को हम हो,
यह जरुरी तो नही !
गलतियाँ हर बार तुमसे हो,
यह जरुरी तो नही !
झुक जाने से अगर,
कोई अपना मना जाये
तो झुक जाने में ,
कोई बुराई तो नही !
आ पास आ कुछ पल के लिए, 
साथ हम रह ले !
कल साथ हो हम,
यह जरुरी तो नही !

Wednesday, June 20, 2012

Sunday, June 17, 2012

सच पूछो तो अच्छा सा लगा !




तेरा मेरे पास आना 
पास आके यूँ मुस्कराना 
सच पूछो तो अच्छा सा लगा !
                                                          
                                                            एक टक बस मुझे देखते रहना
                                                            देखकर मन ही मन मुस्कराना !
                                                            सच पूछो तो अच्छा सा लगा !
बिना कुछ बोले घंटों तक बैठे रहना 
मेरे बालों में तेरी उंगलिओं का फेरना !
सच पूछो तो अच्छा सा लगा !



           खामोश सी नज़रों से कुछ इशारे करना

         कुछ ना कहकर भी सब बोल जाना 
        सच पूछो तो अच्छा सा लगा !

वो ग़ज़ल मेरे चेहरे की  
वो नगमे मेरी बातों की 
सच पूछो तो अच्छा सा लगा !


                                                         
                                                          वो तेरा हँसना और मुझे भी हँसाना 
                                                          मुझे रुलाकर फिर हंसके मानना
                                                          सच पूछो तो अच्छा सा लगा !
                                                                                                       -विधू यादव